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"असम्भव को संभव में बदलने वाली लड़की की सफलता की कहानी "
April 28, 2020 • Mr. Pan singh Argal (Dr. PS Bauddh)

"असम्भव को संभव में बदलने वाली लड़की की सफलता की कहानी "
       Wilma Rudolph .ये कहानी है एक ऐसी लड़की की जिसने अपनी अदम्य जिजीविषा और दृढ इच्छा शक्ति से मेडिकल साइंस और डॉक्टरों के कथन को झूठा साबित कर दिया। ये कहानी है ऐसी लड़की की जो बिना सहारे के चल नही सकती थी। पर वह अपनी इच्छा शक्ति के बल पर उठकर न केवल चली बल्कि विश्व की सबसे तेज धाविका बनी।जी हाँ  दोस्तों ये कहानी है लिविंग लीजेंड विल्मा रुडोल्फ की।
       विल्मा रुडोल्फ का जन्म 23 जून 1940 को अमेरिका के टेनसी प्रान्त के एक अश्वेत परिवार में  प्रीमेच्योर बच्चे के रूप में हुआ था। विलमा अपने माता पिता की 19 वी संतान थी। ये एक पिछड़ा हुआ इलाका था। जहाँ मूलभूत सुविधाएँ नाम मात्र को थी।ये  वे दौर था जब अश्वेतों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता था। विल्मा रुडोल्फ के पिता कुली का कार्य करते थे जबकि उनकी माँ लोगों के घरों में नौकरानी की तरह कार्य करती थी।
      जब विल्मा ढाई वर्ष की थी तो वो पोलियो वायरस से ग्रस्त हो गई। उसके दोनों पैर ख़राब हो गए। उसकी माँ इससे बहुत चिन्तित हो गई पर वह एक बहादुर महिला थी। उसने हार नहीं मानी ।उनके घर से 50 मील की दूरी पर एक अस्पताल था, उसने विल्मा को वहां दिखाया।वहाँ के डॉक्टरों ने विल्मा  का इलाज उस समय जो भी चिकित्सीय खोज थी उसके आधार पर किया और उसके पैरों की मालिश करने को बताया। विल्मा की माँ प्रति सप्ताह उसे अस्पताल ले जाती और बाकी दिनों में उसकी मालिश व अन्य घरेलू उपचार करती।
        अपनी माँ के द्वारा किये गये अथक प्रयासों से और 5 वर्षो के के लगातार इलाज से विल्मा ब्रेसिस पहनकर चलने लगी।अब विल्मा धीरे -धीरे बड़ी हो रही थी तो उसकी माँ ने उसे एक स्थानीय विद्ध्यालय में प्रवेश दिला दिया। विद्ध्यालय में जब बच्चे दौड़ते और खेलते तो विल्मा का मन भी उनके जैसा करने को करता । तब विल्मा का इलाज कर रहे डॉक्टर के.एमवे  ने उसे बास्केट बाल खेलने के  लिए सलाह दी।
        अब विल्मा 11 वर्ष की हो चुकी थी। वो ब्रेसिस के साथ नही खेलना चाहती थी क्योकि उसके साथ न तो वो तेज दौड़ पाती और ठीक से खेल पाती थी। एक दिन उसने वे ब्रेसिस उतार कर फेक दिए और अपनी माँ से कहा में इन्हें अब कभी नहीं पहनूगी।उसने ब्रेसिस के बिना चलने का प्रयास किया पर गिर पड़ी और चोट लग गई वो फिर उठी फिर गिर गई ।अपनी माँ के उत्साह वर्धन से तथा अपनी मजबूत इच्छा शक्ति से वो कुछ दिनों में चलने लगी ।जब ये बात विल्मा का इलाज कर रहे डॉक्टर को पता चला तो वो विल्मा से मिलने आये और उन्होंने विल्मा को दौड़ने के लिए कहा। विल्मा कुछ दूर तक दौड़ी और गिर पड़ी ।डॉक्टर ने दौड़ कर उसे उठा लिया और गले लगा कर बोले -‘बेटी तुमने मुझे गलत साबित कर दिया, तुम दौड़ोगी और तुम सभी को पीछे छोड़ दोगी।‘ डॉक्टर द्वारा कहे इन शब्दों ने जैसे उसके अन्दर एक ऐसी उर्जा का संचार कर दिया जो जीवन पर्यंत उसके लिए प्रेरणा स्रोत का कार्य करती रही।
        15 वर्ष की आयु में विल्मा ने टेनसी राज्य के विश्व विद्यालय में प्रवेश लिया। यह इनकी मुलाकात कोच टेम्पल से हुई। कोच टेम्पल से विल्मा ने अपनी इच्छा जाहिर की, कि वह दुनियां की सबसे तेज धावक बनना चाहती हूँ। कोच टेम्पल विल्मा की दृढ इच्छा शक्ति को देखते हुए उसे ट्रेनिंग देने को तैयार हो गए। उसके बाद विल्मा ने अन्तर्विश्वविद्यालय दौड़ में हिस्सा लिया  और आखिरी स्थान पर रही । विल्मा को लगातार 8 दौड़ प्रतियोगिता में हार का सामना करना पड़ा। लेकिन अपनी हर हार के बाद वो दुबारा दो गुनी ताकत से खड़ी हुई और आख़िरकार 9 वी प्रतियोगिता में वह प्रथम स्थान पर आई।
       1960 में विल्मा को ओलंपिक में खेलने का अवसर मिला। ओलंपिक में अपनी पहली ही दौड़ 100 मी की दौड़ में विल्मा ने उस समय की सबसे तेज धाविका जुता हेन का हराया और गोल्ड मैडल प्राप्त किया। उसके बाद तो विल्मा ने 200 मी दौड़ में जुता हेन को पराजित किया ।400 मी0 रिले दौड़ में विल्मा का मुकाबला एक बार फिर जुता हेन से हुआ । रिले दौड़ में सबसे तेज धावक सबसे बाद में दौड़ता हैं। जब विल्मा की बारी आयी तो विल्मा की साथी खिलाडी ने जो बेटन विल्मा को दी वह उससे छूट कर गिर गई। इतने में जुता हेन आगे निकल गई ।विल्मा ने रूककर बेटन उठाई और बिजली की तेजी से दौड़ते हुए जुता हेन को पीछे छोड़ दिया और इस प्रकार तीसरा गोल्ड मैडल भी विल्मा की टीम को मिला।
         विल्मा पहली अमरीकी अश्वेत खिलाडी थी जिसे 3 स्वर्ण पदक मिले उसके बाद तो जैसे उसनेअश्वेत खिलाडियों के लिए ओलंपिक खेलों के लिए दरवाजे ही खोल दिये। विल्मा रुडोल्फ अखबारों में ब्लैक गेज़ल के नाम से छा गई ।
            तो देखा किस प्रकार एक अपाहिज लड़की ने सुविधाओं के अभाव का रोना ना रोते हुए भी सफलता के शिखर तक पहुँची ।जबकि हम सब कुछ होते हुए भी बिना कठिन संघर्ष किये हुए हार मान लेते हैं। संघर्ष ही जीवन का दूसरा नाम हैं ।मुझे पूरी उम्मीद हैं आप इस रियल लाइफ हीरो से प्रेरणा लेकर अपने लक्ष्य प्राप्ति तक संघर्ष करते रहेंगे और तब तक नहीं रुकेगे जब तक कि आप अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर लेते ।
        💐सादर जय भीम नमो बुद्धाय 💐
                          संकलन 
                इंजी.आर.के.दादौरिया 
सामाजिक चिंतक एवम बुद्ध धम्म उपासक 
             मोबाइल:-9827641590