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भारत में आज नारी 18 वर्ष की आयु के बाद ही बालिग़ अर्थात विवाह योग्य मानी जाती है। परंतु मशहूर अमेरिकन इतिहासकार कैथरीन मायो (Katherine Mayo) ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक "मदर इंडिया" (जो 1927 में छपी थी) में स्पष्ट लिखा है कि भारत का रूढ़िवादी हिन्दू वर्ग नारी के लिए 12 वर्ष की विवाह/सहवास आयु पर ही अडिग था।
April 18, 2020 • Mr. Pan singh Argal (Dr. PS Bauddh)

सभी लड़कियां और महिलाएं विशेष ध्यान दें।

भारत में आज नारी 18 वर्ष की आयु के बाद ही बालिग़ अर्थात विवाह योग्य मानी जाती है। परंतु मशहूर अमेरिकन इतिहासकार कैथरीन मायो (Katherine Mayo) ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक "मदर इंडिया" (जो 1927 में छपी थी) में स्पष्ट लिखा है कि भारत का रूढ़िवादी हिन्दू वर्ग नारी के लिए 12 वर्ष की विवाह/सहवास आयु पर ही अडिग था।

1860 में तो यह आयु 10 वर्ष थी। इसके 30 साल बाद 1891में अंग्रेजी हकुमत ने काफी विरोध के बाद यह आयु 12 वर्ष कर दी। कट्टरपंथी हिन्दुओं ने 34 साल तक इसमें कोई परिवर्तन नहीं होने दिया। इसके बाद 1922 में तब की केंद्रीय विधान सभा में 13 वर्ष का बिल लाया गया। परंतु धर्म के ठेकेदारों के भारी विरोध के कारण वह बिल पास ही नहीं हुआ।

1924 में हरीसिंह गौड़ ने बिल पेश किया। वे सहवास की आयु 14 वर्ष चाहते थे। इस बिल का सबसे ज्यादा विरोध पंडित मदन मोहन मालवीय ने किया, जिसके लिए 'चाँद' पत्रिका ने उनपर लानत भेजी थी। अंत में सिलेक्ट कमेटी ने 13 वर्ष पर सहमति दी और इस तरह 34 वर्ष बाद 1925 में 13 वर्ष की सहवास आयु का बिल पास हुआ।

6 से 12 वर्ष की उम्र की बच्ची सेक्स का विरोध नहीं कर सकती थी उस स्थिति में तो और भी नहीं, जब उसके दिमाग में यह ठूस दिया जाता था कि पति ही उसका भगवान और मालिक है। जरा सोचिये! ऐसी बच्चियों के साथ सेक्स करने के बाद उनकी शारीरिक हालत क्या होती थी? इसका रोंगटे खड़े कर देने वाला वर्णन Katherine Mayo ने अपनी किताब "Mother India" में किया है कि किस तरह बच्चियों की जांघ की हड्डियां खिसक जाती थी, मांस लटक जाता था और कुछ तो अपाहिज तक हो जाती थीं।

6 और 7 वर्ष की पत्नियों में कई तो विवाह के तीन दिन बाद ही तड़प तड़प कर मर जाती थीं। स्त्रियों के लिए इतनी महान थी हमारी मनुवादी संस्कृति। अगर हिन्दुस्तान में अंग्रेज नहीं आते तो भारतीय नारी कभी भी उस नारकीय जीवन से बाहर आ ही नहीं सकती थी।

संविधान बनने से पहले स्त्रियों का कोई अधिकार नहीं था। मनुस्मृति के अनुसार बचपन में पिता के अंडर, जवानी में पति की दासी और बुढ़ापे मे बेटे की कृपा पर निर्भर रहती थी। बाबा साहब डॉ अंबेडकर ने संविधान मे इनको बराबरी का दर्जा दिया। संपत्ति का अधिकार, नौकरी में बराबरी का अधिकार, ये सब बाबा साहब की देन है।

बाबा साहब कहते थे औरत किसी भी जाति की हो, उसके अपने जाति में वही स्थिति थी जो समाज मे दलितों की थी। औरत का नाम नहीं होता था।  किसी की बीवी, किसी की मां, किसी की दादी के नाम से जानी जाती थी।

भारतीय पुरुषों की नजर में महिला बच्चा पैदा करे और पति की दासी बनकर रहे। औरतें इनके लिये अय्याशी के साधन के सिवा कुछ नहीं। 

महिलाओं को समान अधिकार भारतीय संविधान एवं हिन्दू कोड बिल से प्राप्त हुए है। जो बाबा सहाब डाँ. अम्बेडकर की देन है। लेकिन बिडम्बना है कि आज भी जो महिलायें जागरुक नही हैं वह आज भी अधिकारो से वंचित जीवन गुजार रही है। विकृत मानसिकता के लोग आधुनिक भारत में भी पूर्व की विकृत मानसिकता के धोतक होकर महिलाओं का दिन-रात शोषण कर रहे हैं।
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ही महिलाओं की माँ से बढ़कर है जिनके संविधान और हिन्दू कोड़ बिल वज़ह से IAS, PCS, DOCTOR, इन्जीनियर और स्पेस में जाने का मोका मिला l
लेकिन दुःख इस बात का है कि वो ही डॉ अम्बेडकर बाबा साहब को नहीं मानती l