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धम्म प्रचारक - अंतर्राष्ट्रीय बौध्दिस्ट भीमसेना
January 19, 2020 • Mr. Pan singh Argal (Dr. PS Bauddh)

धम्म प्रचारक - अंतर्राष्ट्रीय बौध्दिस्ट भीमसेना

भारत ब्रह्मदेश म्यांमार का कर्जदार है जिसने बुद्ध की खोजी विपस्सना ध्यान विधि को जिंदा रखा...
      ढाई हजार साल पहले भारत से बुद्ध की शिक्षाओं के साथ मानव कल्याण की अद्भुत विपस्सना ध्यान साधना म्यांमार पहुंची और इस वैज्ञानिक विधि को संजोए रखा. हम विपस्सना के आचार्य सत्यनारायण गोयनका जी के बहुत ऋणी है जिन्होंने म्यांमार से इस विद्या को सन् 1969 में भारत में लाकर फिर से पुनर्जीवित किया और आज यह मार्ग दुनिया के हर जाति, धर्म, वर्ग ,लिंग व देश के लिए मानव कल्याण का मार्ग साबित हो रहा है.
       दरअसल जब भारत में बुद्ध और उनके धम्म पर हर ओर से आक्रमण हुआ तो उस मुश्किल काल में यह विद्या भी भारत से लुप्त हो गई और यहां के लोग भी धीरे धीरे इसे भूल गए. लेकिन म्यांमार  सहित कई देशों में बुद्ध की वाणी शुद्ध रूप में जिंदा रही. जहां आज भी वहां के दैनिक जीवन में विपस्सना ध्यान पूरी तरह से रसा और बसा हुआ है. वहां आज भी उनके जीवन का अंग है .
      आचार्य गोयनका जी के पुरखे चूरु, राजस्थान से व्यापार के लिए रंगून के आगे मांडले गए थे .वही उनका जन्म हुआ. मैट्रिक में पूरे म्यांमार में टॉपर रहे .बिजनेस में उनका परिवार बहुत प्रतिष्ठित था. धन भी खूब कमाया. कई सामाजिक संगठनों में सक्रिय थे. 
      लेकिन एकाएक 25 साल की उम्र में माइग्रेन जैसे दुविधा पूर्ण रोग से ग्रस्त हो गए. पूरी दुनिया में इलाज कराया लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा. भयानक पीड़ा के दौर से गुजर रहे थे. इसी दौरान समय ने करवट ली मांडले मे एक विपस्सना सेंटर पर दस दिन का शिविर पूरा किया और वह वह इस दर्दनाक बीमारी से पूरी तरह मुक्त हो गए.
इस घटना ने उनके जीवन का मार्ग व मकसद ही बदल दिया वह 1969 में करोड़ों का जमा जमाया बिजनेस छोड़कर भारत आ गए.बुद्ध को गहराई से पढा और तय किया कि शेष जीवन में बुद्ध के शुद्ध धम्म की इस वैज्ञानिक ध्यान विधि को फिर से भारत में ले जाएंगे.
         उस मुश्किल दौर में भारत में घूम घूम कर ध्यान शिविर आयोजित किए. लोगों को काफी लाभ हुआ और मानव कल्याण की यह महान साधना धीरे धीरे पूरे विश्व में लोकप्रिय हो गई .आज दुनिया में हर संप्रदाय, पंथ व धार्मिक मान्यता के अनुयाई इस ध्यान विधि द्वारा स्वयं व समाज का कल्याण कर रहे हैं.
        आचार्य गोयनकाजी तो बार-बार यह कहते थे की विश्व में बुद्ध की शिक्षाओं का शुद्ध धम्म फैले और वह तो बाबा साहेब का ही सपना पूरा कर रहे हैं. दीक्षाभूमि व चैत्य भूमि पर दिए गए उनके उपदेश अमूल्य है.
         भारत में बुद्ध व उनके धम्म को फिर से पुनर्जीवित करने में परिनिर्वृत गोयनका जी के योगदान को हम बार बार नमन करते हैं .
        सन् 1954 में बाबासाहेब डॉ अंबेडकर बौद्ध संगीति में भाग लेने के लिए रंगून गए थे. वहां से बुद्ध की जो प्रतिमा भेंट की गई थी उसे पुणे के देहरू रोड स्थित बुद्ध विहार में स्थापित किया गया, जो भारत में धम्म प्रचार में नीव की ईट साबित हुए. म्यांमार यात्रा के बाद ही बाबा साहब ने बुद्ध और धम्म की शरण में जाने का दृढ़ निश्चय किया था.                
...भवतु सब्ब मंगल .....सबका कल्याण हो ...
प्रस्तुति:  डॉ. एम एल परिहार
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