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एक विवाह ऐसा भी
November 30, 2019 • Mr. Pan singh Argal (Dr. PS Bauddh)

बिना दहेज़, बिना आडम्बर, बिना कर्म-कांड वाली शादियों ने पकड़ी रफ़्तार। ऐसी पहल में पढ़ी लिखी लड़कियां ही सबसे आगे हैं। खासकर जो निम्न तबकों की है और बड़े संघर्ष से खुद अपना एक मुकाम हासिल किया है। भारत के संविधान को सामने रखकर और बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर को प्रेरणा मानकर शादी करने वालों की फेहरिस्त अब बहुत लंबी है। इसमें कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर से लेकर फौज व पुलिस के सिपाही, आम आदमी तक शामिल है। खास बात यह कि इन तमाम शादियों में लड़कियों की भूमिका बड़ी खास रही जो परिवार, समाज और परंपराओं से भिड़ गई।

याद रखें अखबारों की खबरों से यह प्रतीत होता है कि यह शादियां ईश्वर, पण्डित, पुजारियों को दरकिनार करके बाबा साहेब को साक्षी मानकर शादी की गई होगी लेकिन ऐसा नहीं है। कुछ जोड़ों से व्यक्तिगत तौर पर बात करके पता चला कि इन्होंने तमाम आडम्बर, अंधविश्वास, पाखण्ड को दरकिनार किया है और बाबा साहेब को एक प्रेरणा, एक आदर्श के तौर पर सामने रखा है क्योंकि उनकी वजह से यह सब सम्भव हो सका है इसलिए उनका धन्यबाद अति आवश्यक है ऐसा तमाम लोगों का कथन था।

एक लड़की का मानना यह भी था कि जब हम शादी करते हैं तो तमाम रीति रिवाज, पंडे, पुरोहित बुलाते हैं, राशि, ग्रह, नक्षत्र, शुभ लग्न, मंगल कार्य सब करते हैं सात फेरे, सात वचन, सात जन्मों का साथ माना जाता लेकिन रिश्तों में जब दरार आती है तो इसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेता है ऐसा क्यों? तब सबको संविधान ही क्यों याद आता है? इसलिए शादी भी इसी संविधान के सानिध्य में रहकर करनी चाहिए जो पृरी जिम्मेदारी उठाता है, बचाव करता है और हक, अधिकार भी देता है। लड़ने, जीने का हक देता है। इसलिए धन्यबाद बाबा साहेब और जय संविधान बाकि अब से तमाम आडम्बरों को ना।