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मेरे लेख आस्तिक, नास्तिक और वास्तविकता लेख में, ओशों के विचारों का उद्धरण-"नास्तिक ही सच्चा आस्तिक होता है" एक पाठक भड़क गए, उसी सन्दर्भ में मेरा स्पष्टीकरण🔥
December 30, 2019 • Mr. Pan singh Argal (Dr. PS Bauddh)

🔥मेरे लेख आस्तिक, नास्तिक और वास्तविकता लेख में, ओशों के विचारों का उद्धरण-"नास्तिक ही सच्चा आस्तिक होता है" एक पाठक भड़क गए, उसी सन्दर्भ में मेरा स्पष्टीकरण🔥
      वेद प्रकाश प्रभाकर जी,आप ने सही कहा है। धन्यवाद। 
   भाई साहब पहली बात विषय को गहराई से समझने की जरूरत होती है। यह महाशय, हमारे लेख की बात छोड़िए,खुद क्या लिख रहे हैं एक बार फिर से पढ़ कर, समझकर भेजते तो समझ आ जाता। लेकिन, बस दिमाग में बैठा लिए कि मैं ब्राह्मणवाद को या आर एस एस का छिपा एजेंडा चला रहा हूं। तब समझना और समझाना दोनों मुश्किल हो जाता है। यदि समझना चाहता तो ग्रूप छोड़ने से पहले बात कर लिया होता।
 मैंने खुद के अनुभव से आस्था को तीन भागों में बाटा है, जिसे प्रैक्टिकल रूप में समाज फालो कर रहा है, मैं उसी पर लोगों को ख़ुद अपने आप को परखने के लिए भी कहा हूं और आप तय करो आप किस कैटेगरी में आते हैं। किसी पर थोपने की बात भी नहीं की है।
 १)- आस्तिक- अपना बुद्धि विवेक से तर्क नहीं, हंड्रेड पर्सेंट किसी के द्वारा दिया या बताये गये किसी भी वस्तु को चमत्कारिक शक्ति, देवी -देवता, भगवान समझकर उस पर भरोसा कर लेना और उससे कुछ फल प्राप्ति की कामना करते हुए पूजा पाठ करना। संतुष्टि न होने पर एक दूसरे भगवान को भी बदलते रहना। असफलता पर भाज्ञ-भगवान को कोसते रहना। अपनी गलती को न मानते हुए, उसी की अंधभक्ति में लीन रहना।
  २)- नास्तिक- भगवान या आस्था या किसी को कुछ भी नहीं मानना। यहां तक कि मां बाप को भी नहीं समझना, किसी का डर भी नहीं होना। जो मैं कर रहा हूं, गलत या सही, वहीं सही है और मेरा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है। ऐसे लोग ही धीरे धीरे बर्बरता की तरफ़ बढ़ने लगते हैं। इन्सानियत छोड़ जानवर प्रवित्ति की तरह व्यवहार करने लगते हैं और धीरे-धीरे ऐसे लोगों की जेल की सलाखों में ज़िन्दगी बीतने लगती है। ऐसे लोग भी लाखों करोड़ों में है। ऐसी नास्तिकता भी नहीं चाहिए।
 तीसरा-  वास्तविक ,नास्तिक इसलिए  है कि, किसी भी रूप में किसी भी धर्म द्वारा, मानव निर्मित आस्था, देवी देवता भगवान में कत्तई विश्वास नहीं करता है लेकिन तर्कशील है, अच्छे बुरे को समझने की कोशिश करता है और उसी तरह व्यवहार करता है। सत्य को स्वीकार करता है और उस सत्य जिससे पूरा ब्रह्मांड संचालित होता है, उसे महसूस करता है, वहीं ताकत हमारे हर क्रिया कलाप की चौबीसों घंटे निगरानी करती है।  कुछ भी गलत कार्य करने का,  दिलो-दिमाग में एक भय भी बना रहता है। किसी भी कथन को खुद की वैज्ञानिक तर्क से सत्य की कसौटी पर परखता है तभी मानता है।
 महान वैज्ञानिक दार्शनिक पुरुष गौतम बुद्ध का यह संदेश,- अत्त दीपो भव: इसी अवधारणा पर है और मैं इसी को फालो करता हूं।
  इस विषय पर यदि आप लोगों का कुछ और अलग अनुभव हो तो कृपया शेयर करें धन्यवाद।
 शूद्र शिवशंकर सिंह यादव
 मो०-9869075576