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साँची महाबोधि महोत्सव व अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध मेला और अस्थि अवशेष दर्शन —23 व 24 नवम्बर 2019
November 24, 2019 • Mr. Pan singh Argal (Dr. PS Bauddh)

साँची चलो  23,व 24 नवम्बर को साँची चलो

साँची महाबोधि महोत्सव व अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध मेला और अस्थि अवशेष दर्शन —23 व 24 नवम्बर 2019

भोपाल(साँची)-  भारत के हृदयस्थल मध्यप्रदेश के विश्व धरोहर साँची स्थित स्तूप बौद्धों की विरासत है, जिसे UNESCO द्वारा “विश्व विरासत” का दर्जा मिला हुआ है।यूनेस्को द्वारा साँची स्तूप को 15 अक्टूबर 1982 को विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया गया था। साँची के प्रारंभिक स्तूप को मौर्य साम्राज्य के तीसरे शासक सम्राट अशोक महान ने बनवाया था और यहाँ एक लेख सहित चौमुखी सिंह-स्तम्भ भी खड़ा किया था। सातवाहन, कुषाण काल इत्यादि में भी विकास होता रहा।

इतिहास-

साँची स्तूप को स्तूप संख्या एक के नाम से भी जाना जाता है। साँची में स्तूप और स्मारकों की स्थापना का कार्य तीसरी सताब्दी ईशा पूर्व में सम्राट अशोक के आदेश पर शुरू किया गया और सम्पूर्ण निर्माण कार्य 12वी सताब्दी ईशा पूर्व तक चला। भारत का प्रतीक चिन्ह अशोक स्तंभ भी इसी समय के दौरान बनाया गया था। साँची एक व्यापारिक स्थान था और विदिशा के व्यापारियों ने भी इसके प्रशंसा पत्र के निर्माण और रख रखाव में अहम योगदान और दान दिया है ।

श्रीलंका के बौद्ध काल के ग्रंथ महावामसा के एक संस्करण के अनुसार अशोक साँची प्रान्त से बहुत पहले से ही जुड़े हुए थे। जब अशोक उतराधिकारी थे और वायसराय के रूप में आया करते थे। उसी दौरान उन्हें विदिशा में (साँची से 10 कि.मी. की दूरी पर) रोका गया था। इसी दौरान उन्होंने वही के एक स्थानीय साहूकार ( की बेटी से शादी कर ली जिन्हें देवी के नाम से जाना जाता है। बाद में अशोक और देवी को पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा की प्राप्ति हुयी । सम्राट अशोक ने अपने  जीवन काल में कई युद्ध लड़े लेकिन कलिंग युद्ध में हुए विनाश और नरसंहार के बाद उनका ह्रदय परिवर्तन हो गया और उन्होंने बोध धर्म को अपना लिया । बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए उन्होंने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा।

साँची में शाक्यमुनि महाकारुणिक बुद्ध के शिष्य महामोग्गलायन व सारिपुत्त के धातु अवशेषों को सुरक्षित रखा गया है। इन्हें 65 साल पहले नवंबर माह के आखिरी रविवार को श्रीलंका से सांची लाया गया था। साक्यमुनि महाकारुणिक बुद्ध के दो शिष्य सारिपुत्त और महामोग्गलायन की पवित्र अस्थियां स्तूप परिसर स्थित मंदिर के तलघर से वर्ष में केवल एक बार नवंबर माह के आखिरी शनिवार व रविवार के लिए ही बाहर निकाली जाती है व अनुयायियों के दर्शनार्थ रखी जाती है। इस वर्ष यह दिन 23 -24 नवम्बर 2019 को आ रहा है। जिसके उपलक्ष्य में प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी 23 -24 नवम्बर को “साँची स्तूप महाबोधि महोत्सव” का भव्य आयोजन होने जा रहा है। जिसमें मध्यप्रदेश शासन की संस्कृति मंत्री डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ,शिक्षा मंत्री डॉ.प्रभुराम चौधरी,भारत में श्रीलंका के उच्चायुक्त महामहिम आस्टिन फर्नांडो,वियतनाम संघ,पूज्य भंते बानगल उपतिस्स नायक थेरो (अध्यक्ष श्रीलंका महाबोधि सोसायटी), पूज्य भंते बानगल विमलतिस्स थेरो (इंचार्ज साँची सेंटर) के बौद्ध अनुयायी व बौद्ध भिक्षु शामिल होंगे।

🖊साँची की ऐतिहासिकता—

साँची भारत के मध्यप्रदेश राज्य के रायसेन ज़िले में स्थित एक छोटा सा गांव है। यह भोपाल से 46 किमी पूर्वोत्तर में तथा बेसनगर और विदिशा से 10 किमी की दूरी पर मध्य-प्रदेश के मध्य भाग में है। यहाँ बौद्ध स्मारक हैं, जो कि तीसरी शताब्दी ई.पू. से बारहवीं शताब्दी के बीच के हैं। यह रायसेन ज़िले की एक नगर पंचायत है। यहीं पर यह स्तूप स्थित है। इस स्तूप को घेरे हुए कई तोरण भी हैं। यह प्रेम, शांति, विश्वास और साहस का प्रतीक है। साँची का स्तूप, सम्राट अशोक महान ने तीसरी शती, ई.पू. में बनवाया था। इसका केन्द्र, एक सामान्य अर्द्ध गोलाकार, ईंट निर्मित ढांचा था, जो कि बुद्ध के कुछ अवशेषों पर बना था। इसके शिखर पर एक छत्र था, जो कि स्मारक को दिये गये सम्मान का प्रतीक था।

यह प्रसिद्ध स्थान,जहां अशोक द्वारा निर्मित एक महान स्तूप, जिनके भव्य तोरण द्वार तथा उन पर की गई जगत प्रसिद्ध मूर्तिकारी भारत की प्राचीन वास्तुकला तथा मूर्तिकला के सर्वोत्तम उदाहरणों में हैं।

साँची बौद्धों की प्रसिद्ध नगरी विदिशा (भीलसा) के निकट स्थित है। स्रोतों से पता चलता है कि बौद्धकाल में साँची, महानगरी विदिशा की उपनगरी तथा विहार-स्थली थी। साहित्यिक स्रोतों से पता चलता है कि सम्राट अशोक ने अपनी पत्नी वेदिश (देवी) महादेवी शाक्यकुमारी (अन्य नाम देवी /शाक्यानी के नाम से भी उल्लेख है) के कहने पर ही साँची में यह सुंदर स्तूप बनवाया था। रानी देवी विदिशा की थी और अशोक ने उस समय उनसे विवाह किया था जब वह अपने पिता के राज्यकाल में विदिशा के उपराज्यपाल थे। महिन्द (महेन्द्र) और संघमित्ता (संघमित्रा) का जन्म यहीं पर हुआ था, जो बौद्ध भिक्खु और भिक्खुणी बनकर श्रीलंका में बुद्ध धम्म के प्रचार के लिए गये थे और वहाँ के लोगों को बोधिवृक्ष,बुद्ध और उनकी शिक्षाओं से अवगत कराया।

स्थापना —
यहाँ छोटे-बड़े अनेकों स्तूप हैं,जिनमें स्तूप संख्या 2 सबसे बड़ा है। चारों ओर की हरियाली अद्भुत है। इस स्तूप को घेरे हुए चारों दिशाओं में तोरण भी बने हैं। स्तूप संख्या 1 के पास कई लघु स्तूप भी हैं,जो की विभिन्न भिक्षुओं को उनकी अवस्था(पद) के हिसाब से बनाये गये हैं। उन्ही के समीप एक गुप्त कालीन पाषाण स्तंभ भी है। यह प्रेम,शांति,विश्वास और साहस के प्रतीक हैं। सांची का महान मुख्य स्तूप, मूलतः सम्राट अशोक महान ने तीसरी शती,ई.पू. में बनवाया था। इसके केन्द्र में एक अर्धगोलाकार ईंट निर्मित ढांचा था, जिसमें भगवान बुद्ध के कुछ अवशेष रखे थे। इसके शिखर पर स्मारक को दिये गये ऊंचे सम्मान का प्रतीक रूपी एक छत्र हैं।
सांची की स्थापना बौद्ध धम्म व उसकी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में मौर्यवंश के महान राजा अशोक का सबसे बड़ा योगदान रहा। बुद्ध का संदेश पूरी दुनियां तक पहुंचाने के लिए उन्होंने एक सुनियोजित योजना के तहत कार्य आरंभ किये। सर्वप्रथम उन्होंने बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय दिया। उन्होंने पुराने सात स्तूपों को खुदवा कर उनसे मिले अवशेषों के 84 हज़ार भाग कर अपने राज्य सहित निकटवर्ती देशों में भेजकर बड़ी संख्या में स्तूपों का निर्माण करवाया। इन स्तूपों को स्थायी संरचनाओं में बदला ताकि ये लंबे समय तक बने रह सकें। चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने भारत में जिन स्थानों पर बौद्ध स्मारकों का निर्माण कराया उनमें साँची भी एक था। तब यह बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हो चुका था। ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत में बुद्ध के बोधगया से सांची जाने का उल्लेख नहीं मिलता है। संभव है सांची की उज्जयिनी से निकटता और पूर्व से पश्चिम व उत्तर से दक्षिण जाने वाले यात्रा मार्ग पर होना भी इसकी स्थापना की वजहों में से रहा हो।

कैसे पहुंचे ?
यहाँ रेल मार्ग,सड़क मार्ग और वायुमार्ग तीनों से पहुँचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन तो स्वंय साँची ही है, परंतु सुपरफास्ट गाड़ियां वहां नहीं रुकती हैं। विदिशा या भोपाल से आप यहाँ आ सकते हैं,पर विदिशा स्टेशन सबसे नजदीक है। वायुमार्ग से भोपाल से उतर कर, सड़क मार्ग से यहाँ पहुँचा जा सकता है। विश्व प्रसिद्ध स्थल होने के कारण यह सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है। समीप ही मुख्य सड़क से आने पर संग्रहालय भी है।

साँची आसपास-

 सतधारा-

सतधारा का मतलब सात धाराएं। ये स्तूप हलाली नदी के किनारे करीब 28 एकड़ की जमीन पर बने हुए हैं। सांची से 11 किमी दूर पश्चिम में दो बड़े बौद्ध मठ और 29 छोटे स्तूप भी बने हुए हैं, जो करीब 2500 साल पुराने हैं। इस जगह को सतधारा कहते हैं। भारतीय लेखक डीसी अहीर द्वारा 2003 में लिखी गई किताब बुद्धिस्ट साइट्स एंड श्राइन इन इंडिया : हिस्ट्री आर्ट एंड आर्किटेक्चरÓ में इन स्तूपों का विस्तृत जिक्र है। इसमें बताया गया है कि ये स्तूप मौर्य कालीन हैं और सम्राट अशोक के समय इनका विकास हुआ।

सोनारी– अंग्रेज़ी से अनुवाद किया गया कॉन्टेंट–सोनारी बौद्ध स्तूपों के एक प्राचीन मठ परिसर का पुरातात्विक स्थल है। यह स्थल, एक पहाड़ी पर स्थित है, जो भारत के मध्य प्रदेश के सांची से लगभग 10 किमी दक्षिण पश्चिम में स्थित है। सोनारी बुद्धिस्ट सर्किट का हिस्सा है। वर्तमान में यहां चार स्तूप और एक मठ है।

उदयगिरि –

बेसनगर या प्राचीन विदिशा (भूतपूर्व ग्वालियर सियासत) के निकट उदयगिरि विदिशा नगरी ही का उपनगर था। एक अन्य गुफ़ा में गुप्त संवत् 425-426 ई. में उत्कीर्ण कुमार गुप्त प्रथम के शासन काल का एक अभिलेख है। इसमें शंकर नामक किसी व्यक्ति द्वारा गुफ़ा के प्रवेश-द्वार पर जैन तीर्थ कर पार्श्वनाथ की मूर्ति के प्रतिष्ठापित किए जाने का उल्लेख है- यह लेख इस प्रकार है

यह प्राचीन स्थल भिलसा से चार मील दूर बेतवा तथा बेश नदियों के बीच स्थित है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरि गुहालेख में इस सुप्रसिद्ध पहाड़ी का वर्णन है। यहाँ पर बीस गुफ़ाएँ है। जो बौद्ध और जैन मूर्तिकारी के लिए प्रसिद्ध हैं। मूर्तियाँ विभिन्न पौराणिक कथाओं से सम्बद्ध हैं और अधिकांश गुप्तकालीन हैं। मूर्तिकला की दृष्टि से पाँचवीं गुफ़ा सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसमें वराह अवतार का दृश्य अंकित वराह भगवान का बाँया पाँव नाग राजा के सिर पर दिखलाया गया है।

मशरूम गुफ़ाएँ, उदयगिरि
जो सम्भवतः गुप्तकाल में सम्राटों द्वारा की गये नाग शक्ति के परिहास का प्रतीक है। छठी गुफ़ा में दो द्वारपालों, बुद्ध मूर्तियाँ हैं। गुफ़ा छः से प्राप्त लेख से ज्ञात होता है कि उस क्षेत्र पर सनकानियों का अधिकार था। उदयगिरि के द्वितीय गुफ़ा लेख में चन्द्रगुप्त के सचिव पाटलिपुत्र निवासी वीरसेन उर्फ शाव द्वारा बौद्ध ओर जैन मन्दिर के रूप में गुफ़ा निर्माण कराने का उल्लेख है। वह वहाँ चन्द्रगुप्त के साथ किसी अभियान में आया था। तृतीय उदयगिरि गुफ़ा लेख में कुमार गुप्त के शासन काल में शंकर नामक व्यक्ति द्वारा गुफ़ा संख्या दस के द्वार पर जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूर्ति को प्रतिष्ठित कराये जाने का उल्लेख है।

वास्तुशिल्प
गुप्त काल में उदयगिरि में 20 पत्थर जनिक प्रकोष्ठों का उत्खनन किया गया था, जिनमें दो में चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल से जुड़ी हुई चीज़ें थीं। ये गुफाएं अत्यंत महत्त्वपूर्ण दस्तावेज हैं, क्योंकि वे भारत में हिंदू कला के प्रारंभिक स्वरूप की परिचायक हैं और यह दिखाती हैं कि पांचवी शताब्दी के प्रारंभ में ही बुद्ध मूर्ति शिल्प कला स्थापित हो चुकी थी। उदयगिरि में मिली महत्त्वपूर्ण गुफाओं में एक है गुफा-5, वाराह गुफा। इसकी प्रमुख विशेषता इसका वृहत् शैल जनिक आकार है जो भगवान बुद्ध परिचायक है। भारतीय कलाकारों की क्षमता और उनकी शक्ति इस काल में विध्वंस और विनाश के ख़िलाफ़ एक आध्यात्मिकके रूप में परम ऊंचाइयों पर पहुंची।

गुफ़ाएँ
पहाड़ियों से अन्दर बीस गुफ़ाएँ हैं जो बौद्ध और जैन-मूर्तिकारी के लिए प्रख्यात हैं। मूर्तियाँ विभिन्न पौराणिक कथाओं से सम्बद्ध हैं और अधिकांश गुप्तकालीन हैं। यहाँ पाये जाने वाले स्थानीय पत्थर के कारण इन गुफ़ाओं में से अधिकांश गुफ़ाएँ मूर्ति- विहीन गुफ़ाएँ रह गई हैं।